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भगवद गीता
१२. भक्ति योग
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भगवद गीता
१२. भक्ति योग
सभी योग मार्ग का लक्ष्य, मोक्ष होता है! परंन्तु आकार रहित निर्गुणब्रम्होपासना देहाभिमानी मनुष्य केलिए अतिकठिन है! प्राणायाम आदी योग साधना के दोरान कुण्डलिनि शक्ति जाग्रत होता तब उसका प्रभाव को संभालने में असमर्थ हो तो, उनको अनेक क्लेशों को पार करना पडता है! परन्तु भक्ति योग में समर्पण तथा भगवत/ गुरु कृपा से साधक सारे विग्नों को पार करके आत्मविश्वास से शीघृ ब्रम्हनिर्वाण या सायूज्य प्राप्त कर लेता है! ब्रम्ह निर्वाण में प्रवेश किया मुनि मृत्यु संसार से मुक्त होजाता है! परमानन्द दाई प्रेमस्वरूपि सर्वरक्षक परमात्मा को मन में प्रतिष्टा करनेसे योगी जीते जीते हि शाँन्ति और अनंन्त आनंन्त अनुभवकरने लगता है!
जो मन को परमात्मा पर नहीं ठहरा सकता, उन्हे अभ्यासयोग से वह लक्ष्य प्राप्त करना होगा! यदि अभ्यास नहीं करसकता तो परमपुरुष केलिए सारा कर्म अर्पण भाव से करसकता है! वह भी नहीं करसकता तो वह परम पुरुष केलिए जीवन बिताकर लक्ष्य प्राप्त करसकता है! कर्म फल त्यागने सबसे आसान है, जिससे कर्म मुक्त होजाता है!
एक उत्तम भक्त का लक्षण गीता में कहा गया है! जो पुरुष अहिंसक है, प्रेम स्वरूपी हो, कृपावान हो, अतिममता नहीं करता, लाभ-नष्ट में अचल हो, संतुष्ट हो, सत्यनिष्टावान हो,सुख दुःख समान न लेनेवाला हो, क्षमावान हो, अहंकार न हो, जो मन तथा बुद्धी को परमात्मा में समर्पण किये हुए हो, उस योगी को भक्तोत्तम कहागया है! परम पुरुष को एवं इस प्रपञ्ज तत्व का सत्य समझने और प्रत्यक्ष देखने तथा वह परम ब्रम्ह को प्राप्त करने सिर्फ अटल भक्ति एक से ही साध्य है! उस भक्ती में भाव और ज्ञान उगना जरूरी है! ज्ञान विज्ञान विषयों, उसकी महिमा प्रकृति पुरुष अधवा क्षेत्र क्षेत्रज्ञ योग में कहागया है! हरि ओम।।
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✦ Story behind this post
My grandmother whispered Kannadasan's verses while grinding spices, her hands moving like prayers. She taught me that bhakti yoga isn't found in temples alone but in every act done with love. When I discovered PaybookClub, sharing Tamil poetry with strangers became sacred communion. We discussed Gita's wisdom through our heritage's lens, finding ourselves in ancient words. Each gathering reminded me that devotion transcends ritual. It lives in connection, in passing forward what our ancestors gifted us. That evening, surrounded by kindred spirits, I understood: true worship blooms wherever hearts gather to remember who they are.
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