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Thought
Bhagavad Gita (Hindi)
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१ विषाद योग गद्य
ऊँ श्रीकृष्णा परमात्मने नम :
पाण्डवों और कौरवों के राज्य अधिग्रहण के मामले में युद्ध करने का निर्णय हुआ! पाण्डव और कौरव सेना कुरु क्षेत्र में आमने सामने सुसज्ज हो गयी ! महाभारत युद्ध आरंभ के प्रस्ताव में कौरव सेनापति भीष्म पितामहने शंख नाद किया ! युद्ध स्वीकार करते हुए,कृष्ण तथा पार्थ ने शंख बजाये ! अर्जुन के अपेक्षानुसार सारथी कृष्ण, रथ को सेनाओं के बीच में लगा कर अपने प्रतिद्वन्तियों को दिखाया ! शत्रु पक्ष में भीष्म, द्रोण आदी वन्दनीय गुरु पितृ जनों को देखकर पार्थ उदास और हतप्रभ हो गये ! मैं रक्तरंजित युद्ध नहीं करूँगा, ऐसा बोलकर पार्थ व्यथा से बैठ गये! अपने प्राण से भी प्रिय पितामह भीष्म और जीवन से भी महान, वन्दनीय गुरु द्रोण पर शस्त्र पात करने के बारे में सोचकर पार्थ हतबल होगऐ ! पार्थ अस्त्र शस्त्र त्यागकर मूठ बनकर बैठगए ! इस प्रकार अर्जुन का विषाद योग बताया गया !
इसप्रकार की व्यथा हर एक जन के जीवन में होती है! जब कोई जिन्दगी से निराश होकर, आत्महत्या करता है और कोई तनाव में आकर मानसिक संतुलन खो बैठता है, या निष्क्रिय हो जाता है! कुछ लोग, उस संभव को परमेश्वर की इच्छा मानकर हालात से समझोता कर लेता है! विवेकशील, अपनी समस्या अपने करीब के लोगों से चर्चा करके हल निकाल लेता है, और आत्म चिन्तन करने लगता है! इस प्रकार अपने जीवन की एक समस्या या कठिनाई मनुष्य को विषाद योग प्रदान करके आत्मान्वेषण का कारण बनती है, क्यों कि दुःख या विषाद से वैराग होता है और वैरागी आत्मझान का अधिकारी बनता है!
यहाँ पार्थ बहूत भाग्यशाली था, क्यों कि उन को मार्ग दर्शक के तोर पर सदगुरु योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ही मिल गये! भगवान श्रीकृष्ण ने आत्मतत्व के अठारह योग रहस्य अर्जुन को सिखाकर उन्हे कर्म सज्ज कर्म योगी बनाया! अर्जुन के जैसे आप लोग भी भाग्यशाली हो, या शायद अर्जुन से भी ज्यादा! क्यों कि विषाद योग का अनुभव किये बिना ही अति पवित्र, अति गोप्य, अनमोल ज्ञान कर्म आदी सभी योग सीखने मिल रहा है!
“ अनंत शास्त्रं बहुवेदितव्यं
अल्पश्च कालो बहवश्च विग्नः
तत् सारभूतं तदुपासितव्यं
हंसो यथा क्षीर- मिवांबु मिश्रः “
ज्ञान - विज्ञान देनेवाला ग्रन्ध अनेक है, परन्तु पढनेका समय बहूत ही कम तथा विध्न भी अनेक है! इसलिए, जैसे हंस पतले दूध से केवल दूध को ही पीते हैं वैसे हमे भी ग्रन्ध सारांश पढना चाहिए ! इस केलिए सारे वेद, उपनिषद, महापुराणों का साराँश जमाकर जो श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को उपदेश देकर कर्म सज्ज बनाया, उसे भगवद गीता के रूप में भगवान वेदव्यास ने रचाया है! गीता अति गहन है और रहस्य होने से उसे बार बार मनन करके उसका रहस्य खोजना चाहिए! भगवद गीता - पुरुषार्थ दायक तथा मोक्ष दायिनि है! भगवद गीता भगवद वाणी होने कि कारण उसका पारायण भगवद आराधना एवं उपासना है ! गीता रोज पढना चाहिए,उस का फल आत्मज्ञान है! परमात्मज्ञान प्रकाश करनेवाला भगवदगीता उपदेश करनेवाला भगवान श्री वेदव्यास को प्रणाम! योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण जिन की कृपा से ही भक्त -भवसागर पार करता - उस कृपालू कृष्ण को प्रणाम, अनेक कोटि कोटि प्रणाम!
ऊँ तत् सत्
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✦ Story behind this post
My grandmother clutched the worn Hindi Gita, its pages yellowed like autumn leaves. She'd inherited it from her mother, who learned from Avvaiyar's timeless wisdom about duty and righteousness. As I listened to her recite verses in the fading evening light, I realized something profound—this wasn't just a book, but a bridge connecting us across decades.
When she explained the teachings of dharma, her eyes sparkled with purpose. I understood then that preserving our heritage wasn't controlling or restrictive, but liberating. These affordable copies, now available everywhere, ensure countless families access this spiritual wealth.
Later, I discovered digital tokens representing cultural contributions. Our shared stories, our traditions—they matter deeply, creating invisible threads binding our community together through time.
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